Saturday, 10 July 2010

तुम संग

तुम संग जीवन कैसा होगा
तुम्ही बताओ मेरे मन
चंद प्यारी बातें होंगी
कुछ मीठी सौगातें होंगी
यूँ बरसेगा स्नेह का सावन
जिसमें भीगेंगे तन और मन
तेरा मेरा साथ होगा
और हाथों में हाथ होगा
गुथी हुई सी सासें होंगी
कुछ बेचैन उमासें होंगी
चला करेंगे चाँद तक
गिन गिन कर ये सारे तारे
भर लायेंगे जेबों में सारे
फिर अंधियारी सी रातें होंगी
पर साथ तुम्हारा होगा मन
तुम संग जीवन कैसा होगा
तुम्ही बताओ मेरे मन...

फिर से

तुम्हारे जाने के बाद
हुई बारिश में भीगा
मेरी तकिया का कोना
और वो मुड़ी तुड़ी चादर,
जिसने कई अकेली रातों में
मेरा साथ दिया,
धोकर फिर फैला दी
समय की धूप में,
और देखते ही देखते
वो सपनों का इन्द्रधनुष
फिर से जगमगाने लगा
जिसमें से टूटे मोतियों को
पलकों पर मैंने
फिर से सजाया
और मीठी मुस्कराहट लिए
मैं फिर से नयी सी हो गयी

आओ..

थाम के मेरी बाहें
मुझे ऐसे जहान में ले चलो
जहाँ तुम हो,मैं हूँ
और हो एक शांत नदी
जिसके किनारे बैठ कर
मैं सुलझाऊं
तुम्हारे बालों की लटें
तुम्हारे चेहरे की उलझनें
और तुम्हारे माथे पर पड़ी
उन सलवटों को
जो मेरे इंतज़ार में थीं
नदी किनारे उस पत्थर पर बैठकर
तुम्हेरे हाथों को हाथों में लेकर
और तुम्हारे चेहरे को गोद में रखकर
मैं हलके से फूँक दूं
तुम्हारी पलकों की थकन को
और एक बच्चे की तरह
तुम्हें सुला दूं

तुमने पूछा..

तुमने पूछा मुझसे
मुझसे मिलना चाहती हो?
मुझे छूना चाहती हो?
सोचने लगी कि क्या चाहती हूँ मैं
जानना चाहोगे क्या जवाब मिला?
तुमसे मैंने खुद को पाया है
मेरी आत्मा जो मुझे छोड़कर
जाने लगी थी
लौट आई मुझ में
जीती रही हूँ मैं
तुमको खुद में
तुम्हे छुआ है,पाया है
कई बार
तुम मेरे लिए एक सपना हो
एक मीठा सपना
जो पलकों पे सजाये
मैं मीठी नींद सो रही हूँ
इसीलिए शायद
एक डर है मन में
कि तुमसे मिलकर
मेरा सुन्दर सपना कहीं टूट न जाये
वरना टूट जाउंगी मैं भी
जीना चाहती हूँ मैं इस सपने को
सारी उम्र
और सोना चाहती हूँ
तुम्हें लिए हुए
इन पलकों में,बस...