तुम्हारी झूठी मुस्कराहट,
तुम्हारी नज़रों की उदासी,
देखती हूँ मैं,
और सोचने लगती हूँ,
कि बाँहों में भरकर,
ले चलूँ तुम्हें,
तराई में,
जहाँ धान के खेतों के बिस्तर में,
लिटाकर तुम्हें,
हवा की चादर उढ़ाऊँ,
चाँद का सिरहाना बनाऊं,
और अपने हाथों को,
तुम्हारे चेहरे के दोनों तरफ़ रखकर,
अपने होठों को,
तुम्हारी पलकों से छुआकर,
चूम लूँ तुम्हारे आंसू,
जो सिर्फ़ मैं देखती हूँ,
और भर दूँ तुम्हारी आंखों में,
नए सपने,नई उमंगें,
नई चमक,
और तुम्हें जीना सिखा दूँ...
Saturday, 3 October 2009
सूनी सड़क
कल शाम,उस सूनी सड़क पर,
चलते चलते,
यूँ ही तुमने अपनी ऊँगली,
मेरी उंगली में फँसाली थी,
मेरी नज़रें,ख़ुद से ही शर्मा गयीं,
और मैं देखने लगी,
दूर क्षितिज पर,
डूबते सूरज को,
मेरे मन से उठती,
कच्ची मिटटी की खुश्बू,
तुम्हें भी घेरने लगी,
क़दमों की रफ़्तार,
धीमी पड़ती गई,
पर आख़िर,
मंजिल तो आनी ही थी,
हौले से अपनी उँगलियों को छुडाकर,
और उस खुशबू को सहेजकर,
अलग अलग पर जुड़े हुए से,
हम भी खो गए...
चलते चलते,
यूँ ही तुमने अपनी ऊँगली,
मेरी उंगली में फँसाली थी,
मेरी नज़रें,ख़ुद से ही शर्मा गयीं,
और मैं देखने लगी,
दूर क्षितिज पर,
डूबते सूरज को,
मेरे मन से उठती,
कच्ची मिटटी की खुश्बू,
तुम्हें भी घेरने लगी,
क़दमों की रफ़्तार,
धीमी पड़ती गई,
पर आख़िर,
मंजिल तो आनी ही थी,
हौले से अपनी उँगलियों को छुडाकर,
और उस खुशबू को सहेजकर,
अलग अलग पर जुड़े हुए से,
हम भी खो गए...
तुम थे
रात भर सोई रही,
तकिये में मुँह छुपाकर,
उसे तुम्हारा कन्धा समझकर,
अपनी उँगलियों के पोरों को पोरों से मिलकर,
और उसे,तुम्हारे हाथ पर अपना हाथ समझकर,
जब जब नींद खुली,
महसूस किया
चादर को अपने चारों ओर,
और मन ही मन मुस्कुराती रही,
उसे तुम्हारी गर्माहट समझकर,
बार बार अपना नाम लिया,
रात भर,
और आवाज़ कुछ तुम्हारी सी लगी,
मेरे बाल उड़ते रहे हवा से,
और मैं समझती रही,
कि ये तुम्हारी शरारत है,
और जब नींद आई,
तो नज़रों में तुम्हारा प्यार था,
जो रात भर मेरे साथ था...
तकिये में मुँह छुपाकर,
उसे तुम्हारा कन्धा समझकर,
अपनी उँगलियों के पोरों को पोरों से मिलकर,
और उसे,तुम्हारे हाथ पर अपना हाथ समझकर,
जब जब नींद खुली,
महसूस किया
चादर को अपने चारों ओर,
और मन ही मन मुस्कुराती रही,
उसे तुम्हारी गर्माहट समझकर,
बार बार अपना नाम लिया,
रात भर,
और आवाज़ कुछ तुम्हारी सी लगी,
मेरे बाल उड़ते रहे हवा से,
और मैं समझती रही,
कि ये तुम्हारी शरारत है,
और जब नींद आई,
तो नज़रों में तुम्हारा प्यार था,
जो रात भर मेरे साथ था...
क्या कहूँ
ओस की बूंदों सी टपकती चाँदनी,
जब पलकों से मेरी टकराती है,
महसूस करती हूँ मैं,
खुशबू तेरी,
जो इन हरसिंगार के फूलों से आती है,
सूरज की किरणों को छू पाती हूँ,
अपनी उँगलियों के पोरों से,
और तुम्हारी नज़रों की गर्माहट,
मुझे अजीब सी नमी दे जाती है,
घने कोहरे की तरह,
मैं समेट लूँ तुम्हें,
चाहने लगती हूँ,
और जीने लगती हूँ,
हर पल,हर घड़ी,
तुम्हें अपने साथ..
जब पलकों से मेरी टकराती है,
महसूस करती हूँ मैं,
खुशबू तेरी,
जो इन हरसिंगार के फूलों से आती है,
सूरज की किरणों को छू पाती हूँ,
अपनी उँगलियों के पोरों से,
और तुम्हारी नज़रों की गर्माहट,
मुझे अजीब सी नमी दे जाती है,
घने कोहरे की तरह,
मैं समेट लूँ तुम्हें,
चाहने लगती हूँ,
और जीने लगती हूँ,
हर पल,हर घड़ी,
तुम्हें अपने साथ..
Friday, 2 October 2009
तुम जब आए...
मेरी ज़िन्दगी में आकर,
तुमने मुझे मेरेपन की नई अनुभूति दी है,
जो भूल बैठी मैं ख़ुद को,
वही मेरे वजूद को मजबूती दी है,
वो शब्द जो मेरे हाथों से बिखर से गए थे,
उन्हें मेरे बस में कर के,
खो जाने के एहसास से मुक्ति दी है,
मेरी ज़िन्दगी में आकर,
तुमने मुझे मेरी अभिव्यक्ति दी है,
खालीपन का वो एहसास,
जो बसने लगा था मेरे अन्दर बाहर,
उस एहसास को मिटाकर,
तुमने मुझे एक नयी ज़िन्दगी दी है....
तुमने मुझे मेरेपन की नई अनुभूति दी है,
जो भूल बैठी मैं ख़ुद को,
वही मेरे वजूद को मजबूती दी है,
वो शब्द जो मेरे हाथों से बिखर से गए थे,
उन्हें मेरे बस में कर के,
खो जाने के एहसास से मुक्ति दी है,
मेरी ज़िन्दगी में आकर,
तुमने मुझे मेरी अभिव्यक्ति दी है,
खालीपन का वो एहसास,
जो बसने लगा था मेरे अन्दर बाहर,
उस एहसास को मिटाकर,
तुमने मुझे एक नयी ज़िन्दगी दी है....
चलो
कोई ख्वाहिश न रहे बाकी,
मेरे साथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ,
हाथों में थामो मेरा हाथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ,
जहाँ सूरज चमकता हो रात भर,
तारे जगमगायें कदमों पर,
चलो तुम्हें....
धरती रहे थमी और आसमान चले साथ,
नदी न ढूंढे समंदर का किनारा,
और तुम रहो मेरे साथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ,
तेरी पलकों के सिरहाने ख्वाब बनके,
बैठी रहूँ मैं रात भर,
बरसती रहे चाँदनी,
और छू सकूँ मैं खुशबू तेरी,
बढ़ाकर अपना हाथ,
कोई ख्वाहिश न रहे बाकी,
मेरे साथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ...
मेरे साथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ,
हाथों में थामो मेरा हाथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ,
जहाँ सूरज चमकता हो रात भर,
तारे जगमगायें कदमों पर,
चलो तुम्हें....
धरती रहे थमी और आसमान चले साथ,
नदी न ढूंढे समंदर का किनारा,
और तुम रहो मेरे साथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ,
तेरी पलकों के सिरहाने ख्वाब बनके,
बैठी रहूँ मैं रात भर,
बरसती रहे चाँदनी,
और छू सकूँ मैं खुशबू तेरी,
बढ़ाकर अपना हाथ,
कोई ख्वाहिश न रहे बाकी,
मेरे साथ,
चलो तुम्हें उस राह पर ले चलूँ...
Thursday, 1 October 2009
पहाड़ी पगडण्डी...

ये कविता किसीको समर्पित है,शायद किसी अनदेखे किसी अनजाने को.पर वो जो भी है उसने मेरे शब्दों को जगा दिया.....बस इतना ही..
एक दिन यूँ ही,
चलते चलते वो पहाड़ी पगडण्डी,
ले आई मुझे,नदी के किनारे,
और देखा मैंने,तुम्हें
उस पार खड़े,
गुमसुम, उदास
देख रहे थे तुम,
एकटक,उस नदी की लहरों को,
पहचानने की एक कोशिश,
कौन सी लहर है मेरे नाम की,
मैं देखती रही तुम्हें उस पार से,
इंतज़ार करती रही,
कि तुम देखो,मुझे
पहचानो और समेट लो,
कि मैं ही तो वो लहर हूँ,
जिसे तुम बरसों से तलाश रहे थे,
फिर एक लहर आई,
मुस्कान की,तुम्हारे होठों पर,
और हम चल दिए,
किनारे-किनारे,
उस छोर की तलाश में,
जहाँ नदी के किनारे मिलेंगे,
और हम भी,
एक दिन यूँ ही....
चलते चलते वो पहाड़ी पगडण्डी,
ले आई मुझे,नदी के किनारे,
और देखा मैंने,तुम्हें
उस पार खड़े,
गुमसुम, उदास
देख रहे थे तुम,
एकटक,उस नदी की लहरों को,
पहचानने की एक कोशिश,
कौन सी लहर है मेरे नाम की,
मैं देखती रही तुम्हें उस पार से,
इंतज़ार करती रही,
कि तुम देखो,मुझे
पहचानो और समेट लो,
कि मैं ही तो वो लहर हूँ,
जिसे तुम बरसों से तलाश रहे थे,
फिर एक लहर आई,
मुस्कान की,तुम्हारे होठों पर,
और हम चल दिए,
किनारे-किनारे,
उस छोर की तलाश में,
जहाँ नदी के किनारे मिलेंगे,
और हम भी,
एक दिन यूँ ही....
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