Saturday, 3 October 2009

आओ तुम्हें जीना सिखा दूँ

तुम्हारी झूठी मुस्कराहट,
तुम्हारी नज़रों की उदासी,
देखती हूँ मैं,
और सोचने लगती हूँ,
कि बाँहों में भरकर,
ले चलूँ तुम्हें,
तराई में,
जहाँ धान के खेतों के बिस्तर में,
लिटाकर तुम्हें,
हवा की चादर उढ़ाऊँ,
चाँद का सिरहाना बनाऊं,
और अपने हाथों को,
तुम्हारे चेहरे के दोनों तरफ़ रखकर,
अपने होठों को,
तुम्हारी पलकों से छुआकर,
चूम लूँ तुम्हारे आंसू,
जो सिर्फ़ मैं देखती हूँ,
और भर दूँ तुम्हारी आंखों में,
नए सपने,नई उमंगें,
नई चमक,
और तुम्हें जीना सिखा दूँ...

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