Thursday, 1 October 2009

पहाड़ी पगडण्डी...


ये कविता किसीको समर्पित है,शायद किसी अनदेखे किसी अनजाने को.पर वो जो भी है उसने मेरे शब्दों को जगा दिया.....बस इतना ही..

एक दिन यूँ ही,
चलते चलते वो पहाड़ी पगडण्डी,
ले आई मुझे,नदी के किनारे,
और देखा मैंने,तुम्हें
उस पार खड़े,
गुमसुम, उदास
देख रहे थे तुम,
एकटक,उस नदी की लहरों को,
पहचानने की एक कोशिश,
कौन सी लहर है मेरे नाम की,
मैं देखती रही तुम्हें उस पार से,
इंतज़ार करती रही,
कि तुम देखो,मुझे
पहचानो और समेट लो,
कि मैं ही तो वो लहर हूँ,
जिसे तुम बरसों से तलाश रहे थे,
फिर एक लहर आई,
मुस्कान की,तुम्हारे होठों पर,
और हम चल दिए,
किनारे-किनारे,
उस छोर की तलाश में,
जहाँ नदी के किनारे मिलेंगे,
और हम भी,
एक दिन यूँ ही....

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