Saturday, 3 October 2009

क्या कहूँ

ओस की बूंदों सी टपकती चाँदनी,
जब पलकों से मेरी टकराती है,
महसूस करती हूँ मैं,
खुशबू तेरी,
जो इन हरसिंगार के फूलों से आती है,
सूरज की किरणों को छू पाती हूँ,
अपनी उँगलियों के पोरों से,
और तुम्हारी नज़रों की गर्माहट,
मुझे अजीब सी नमी दे जाती है,
घने कोहरे की तरह,
मैं समेट लूँ तुम्हें,
चाहने लगती हूँ,
और जीने लगती हूँ,
हर पल,हर घड़ी,
तुम्हें अपने साथ..

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