Saturday, 3 October 2009

तुम थे

रात भर सोई रही,
तकिये में मुँह छुपाकर,
उसे तुम्हारा कन्धा समझकर,
अपनी उँगलियों के पोरों को पोरों से मिलकर,
और उसे,तुम्हारे हाथ पर अपना हाथ समझकर,
जब जब नींद खुली,
महसूस किया
चादर को अपने चारों ओर,
और मन ही मन मुस्कुराती रही,
उसे तुम्हारी गर्माहट समझकर,
बार बार अपना नाम लिया,
रात भर,
और आवाज़ कुछ तुम्हारी सी लगी,
मेरे बाल उड़ते रहे हवा से,
और मैं समझती रही,
कि ये तुम्हारी शरारत है,
और जब नींद आई,
तो नज़रों में तुम्हारा प्यार था,
जो रात भर मेरे साथ था...

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