तुम संग जीवन कैसा होगा
तुम्ही बताओ मेरे मन
चंद प्यारी बातें होंगी
कुछ मीठी सौगातें होंगी
यूँ बरसेगा स्नेह का सावन
जिसमें भीगेंगे तन और मन
तेरा मेरा साथ होगा
और हाथों में हाथ होगा
गुथी हुई सी सासें होंगी
कुछ बेचैन उमासें होंगी
चला करेंगे चाँद तक
गिन गिन कर ये सारे तारे
भर लायेंगे जेबों में सारे
फिर अंधियारी सी रातें होंगी
पर साथ तुम्हारा होगा मन
तुम संग जीवन कैसा होगा
तुम्ही बताओ मेरे मन...
aas.....
Saturday, 10 July 2010
फिर से
तुम्हारे जाने के बाद
हुई बारिश में भीगा
मेरी तकिया का कोना
और वो मुड़ी तुड़ी चादर,
जिसने कई अकेली रातों में
मेरा साथ दिया,
धोकर फिर फैला दी
समय की धूप में,
और देखते ही देखते
वो सपनों का इन्द्रधनुष
फिर से जगमगाने लगा
जिसमें से टूटे मोतियों को
पलकों पर मैंने
फिर से सजाया
और मीठी मुस्कराहट लिए
मैं फिर से नयी सी हो गयी
हुई बारिश में भीगा
मेरी तकिया का कोना
और वो मुड़ी तुड़ी चादर,
जिसने कई अकेली रातों में
मेरा साथ दिया,
धोकर फिर फैला दी
समय की धूप में,
और देखते ही देखते
वो सपनों का इन्द्रधनुष
फिर से जगमगाने लगा
जिसमें से टूटे मोतियों को
पलकों पर मैंने
फिर से सजाया
और मीठी मुस्कराहट लिए
मैं फिर से नयी सी हो गयी
आओ..
थाम के मेरी बाहें
मुझे ऐसे जहान में ले चलो
जहाँ तुम हो,मैं हूँ
और हो एक शांत नदी
जिसके किनारे बैठ कर
मैं सुलझाऊं
तुम्हारे बालों की लटें
तुम्हारे चेहरे की उलझनें
और तुम्हारे माथे पर पड़ी
उन सलवटों को
जो मेरे इंतज़ार में थीं
नदी किनारे उस पत्थर पर बैठकर
तुम्हेरे हाथों को हाथों में लेकर
और तुम्हारे चेहरे को गोद में रखकर
मैं हलके से फूँक दूं
तुम्हारी पलकों की थकन को
और एक बच्चे की तरह
तुम्हें सुला दूं
मुझे ऐसे जहान में ले चलो
जहाँ तुम हो,मैं हूँ
और हो एक शांत नदी
जिसके किनारे बैठ कर
मैं सुलझाऊं
तुम्हारे बालों की लटें
तुम्हारे चेहरे की उलझनें
और तुम्हारे माथे पर पड़ी
उन सलवटों को
जो मेरे इंतज़ार में थीं
नदी किनारे उस पत्थर पर बैठकर
तुम्हेरे हाथों को हाथों में लेकर
और तुम्हारे चेहरे को गोद में रखकर
मैं हलके से फूँक दूं
तुम्हारी पलकों की थकन को
और एक बच्चे की तरह
तुम्हें सुला दूं
तुमने पूछा..
तुमने पूछा मुझसे
मुझसे मिलना चाहती हो?
मुझे छूना चाहती हो?
सोचने लगी कि क्या चाहती हूँ मैं
जानना चाहोगे क्या जवाब मिला?
तुमसे मैंने खुद को पाया है
मेरी आत्मा जो मुझे छोड़कर
जाने लगी थी
लौट आई मुझ में
जीती रही हूँ मैं
तुमको खुद में
तुम्हे छुआ है,पाया है
कई बार
तुम मेरे लिए एक सपना हो
एक मीठा सपना
जो पलकों पे सजाये
मैं मीठी नींद सो रही हूँ
इसीलिए शायद
एक डर है मन में
कि तुमसे मिलकर
मेरा सुन्दर सपना कहीं टूट न जाये
वरना टूट जाउंगी मैं भी
जीना चाहती हूँ मैं इस सपने को
सारी उम्र
और सोना चाहती हूँ
तुम्हें लिए हुए
इन पलकों में,बस...
मुझसे मिलना चाहती हो?
मुझे छूना चाहती हो?
सोचने लगी कि क्या चाहती हूँ मैं
जानना चाहोगे क्या जवाब मिला?
तुमसे मैंने खुद को पाया है
मेरी आत्मा जो मुझे छोड़कर
जाने लगी थी
लौट आई मुझ में
जीती रही हूँ मैं
तुमको खुद में
तुम्हे छुआ है,पाया है
कई बार
तुम मेरे लिए एक सपना हो
एक मीठा सपना
जो पलकों पे सजाये
मैं मीठी नींद सो रही हूँ
इसीलिए शायद
एक डर है मन में
कि तुमसे मिलकर
मेरा सुन्दर सपना कहीं टूट न जाये
वरना टूट जाउंगी मैं भी
जीना चाहती हूँ मैं इस सपने को
सारी उम्र
और सोना चाहती हूँ
तुम्हें लिए हुए
इन पलकों में,बस...
Saturday, 3 October 2009
आओ तुम्हें जीना सिखा दूँ
तुम्हारी झूठी मुस्कराहट,
तुम्हारी नज़रों की उदासी,
देखती हूँ मैं,
और सोचने लगती हूँ,
कि बाँहों में भरकर,
ले चलूँ तुम्हें,
तराई में,
जहाँ धान के खेतों के बिस्तर में,
लिटाकर तुम्हें,
हवा की चादर उढ़ाऊँ,
चाँद का सिरहाना बनाऊं,
और अपने हाथों को,
तुम्हारे चेहरे के दोनों तरफ़ रखकर,
अपने होठों को,
तुम्हारी पलकों से छुआकर,
चूम लूँ तुम्हारे आंसू,
जो सिर्फ़ मैं देखती हूँ,
और भर दूँ तुम्हारी आंखों में,
नए सपने,नई उमंगें,
नई चमक,
और तुम्हें जीना सिखा दूँ...
तुम्हारी नज़रों की उदासी,
देखती हूँ मैं,
और सोचने लगती हूँ,
कि बाँहों में भरकर,
ले चलूँ तुम्हें,
तराई में,
जहाँ धान के खेतों के बिस्तर में,
लिटाकर तुम्हें,
हवा की चादर उढ़ाऊँ,
चाँद का सिरहाना बनाऊं,
और अपने हाथों को,
तुम्हारे चेहरे के दोनों तरफ़ रखकर,
अपने होठों को,
तुम्हारी पलकों से छुआकर,
चूम लूँ तुम्हारे आंसू,
जो सिर्फ़ मैं देखती हूँ,
और भर दूँ तुम्हारी आंखों में,
नए सपने,नई उमंगें,
नई चमक,
और तुम्हें जीना सिखा दूँ...
सूनी सड़क
कल शाम,उस सूनी सड़क पर,
चलते चलते,
यूँ ही तुमने अपनी ऊँगली,
मेरी उंगली में फँसाली थी,
मेरी नज़रें,ख़ुद से ही शर्मा गयीं,
और मैं देखने लगी,
दूर क्षितिज पर,
डूबते सूरज को,
मेरे मन से उठती,
कच्ची मिटटी की खुश्बू,
तुम्हें भी घेरने लगी,
क़दमों की रफ़्तार,
धीमी पड़ती गई,
पर आख़िर,
मंजिल तो आनी ही थी,
हौले से अपनी उँगलियों को छुडाकर,
और उस खुशबू को सहेजकर,
अलग अलग पर जुड़े हुए से,
हम भी खो गए...
चलते चलते,
यूँ ही तुमने अपनी ऊँगली,
मेरी उंगली में फँसाली थी,
मेरी नज़रें,ख़ुद से ही शर्मा गयीं,
और मैं देखने लगी,
दूर क्षितिज पर,
डूबते सूरज को,
मेरे मन से उठती,
कच्ची मिटटी की खुश्बू,
तुम्हें भी घेरने लगी,
क़दमों की रफ़्तार,
धीमी पड़ती गई,
पर आख़िर,
मंजिल तो आनी ही थी,
हौले से अपनी उँगलियों को छुडाकर,
और उस खुशबू को सहेजकर,
अलग अलग पर जुड़े हुए से,
हम भी खो गए...
तुम थे
रात भर सोई रही,
तकिये में मुँह छुपाकर,
उसे तुम्हारा कन्धा समझकर,
अपनी उँगलियों के पोरों को पोरों से मिलकर,
और उसे,तुम्हारे हाथ पर अपना हाथ समझकर,
जब जब नींद खुली,
महसूस किया
चादर को अपने चारों ओर,
और मन ही मन मुस्कुराती रही,
उसे तुम्हारी गर्माहट समझकर,
बार बार अपना नाम लिया,
रात भर,
और आवाज़ कुछ तुम्हारी सी लगी,
मेरे बाल उड़ते रहे हवा से,
और मैं समझती रही,
कि ये तुम्हारी शरारत है,
और जब नींद आई,
तो नज़रों में तुम्हारा प्यार था,
जो रात भर मेरे साथ था...
तकिये में मुँह छुपाकर,
उसे तुम्हारा कन्धा समझकर,
अपनी उँगलियों के पोरों को पोरों से मिलकर,
और उसे,तुम्हारे हाथ पर अपना हाथ समझकर,
जब जब नींद खुली,
महसूस किया
चादर को अपने चारों ओर,
और मन ही मन मुस्कुराती रही,
उसे तुम्हारी गर्माहट समझकर,
बार बार अपना नाम लिया,
रात भर,
और आवाज़ कुछ तुम्हारी सी लगी,
मेरे बाल उड़ते रहे हवा से,
और मैं समझती रही,
कि ये तुम्हारी शरारत है,
और जब नींद आई,
तो नज़रों में तुम्हारा प्यार था,
जो रात भर मेरे साथ था...
Subscribe to:
Posts (Atom)