Saturday, 10 July 2010

आओ..

थाम के मेरी बाहें
मुझे ऐसे जहान में ले चलो
जहाँ तुम हो,मैं हूँ
और हो एक शांत नदी
जिसके किनारे बैठ कर
मैं सुलझाऊं
तुम्हारे बालों की लटें
तुम्हारे चेहरे की उलझनें
और तुम्हारे माथे पर पड़ी
उन सलवटों को
जो मेरे इंतज़ार में थीं
नदी किनारे उस पत्थर पर बैठकर
तुम्हेरे हाथों को हाथों में लेकर
और तुम्हारे चेहरे को गोद में रखकर
मैं हलके से फूँक दूं
तुम्हारी पलकों की थकन को
और एक बच्चे की तरह
तुम्हें सुला दूं

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