Saturday, 10 July 2010

फिर से

तुम्हारे जाने के बाद
हुई बारिश में भीगा
मेरी तकिया का कोना
और वो मुड़ी तुड़ी चादर,
जिसने कई अकेली रातों में
मेरा साथ दिया,
धोकर फिर फैला दी
समय की धूप में,
और देखते ही देखते
वो सपनों का इन्द्रधनुष
फिर से जगमगाने लगा
जिसमें से टूटे मोतियों को
पलकों पर मैंने
फिर से सजाया
और मीठी मुस्कराहट लिए
मैं फिर से नयी सी हो गयी

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